गुरुवार, 3 जून 2010

शुक्रवार, 28 मई 2010

नक्सिलयों से नरमी क्यों

मुट्ठी भर नक्सली देश के सत्ता को चुनौती दे रहे हैं। हमारी सरकार परंपरात रूप से बड़े हमले के बाद कड़ी कार्रवाई और सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद करने का बयान दे देती है। हमारे गृह मंत्री कुछ ईमानदार हैं, सो थोड़ी बहुत हिचकिचाहट के साथ यह स्वीकार कर लेते हैं कि उनके हाथ बंधे हैं। नक्सलियों से निपटने के लिए हमारे पास अधिकार नहीं हैं। और उसके बाद वित्त मंत्री का नसीहत भरा बयान आ जाता है कि यह भीतर की बात है। चिदंबरम को इसे सार्वजनिक नहीं करना चाहिए। इतना सुनने के बाद बेचारे चिदंबरम फिर बैकफुट पर चले जाते हैं। नक्सलियों से कहते हैं कि भाई आप केवल बहत्तर घंटे के लिए हिंसा रोक दें। हमसे बातचीत कर लें। लेकिन नक्सली उनकी पेशकश ठुकरा देते हैं। और फिर एक बड़ी वारदात हो जाती है। इस बार पश्चिम बंगाल में रेलवे ट्रैक उड़ा दिया जाता है और मुंबई जा रही एक्सप्रेस गाड़ी हादसे का शिकार हो जाती है। और ७६ जानें चली जाती हैं।
जाहिर है कि पहले की तरह इस बार भी परंपरागत रूप से वही बयान जारी किए जाएंगे, जो पहले जारी किए जाते थे। और कुछ ही दिन बाद नक्सली नई वारदात कर फिर बड़ी संख्या में लोगों को मार डालेंगे। सवाल यह है कि ऐसा कब तक होगा। हालांकि इसका जवाब किसी के पास नहीं है। नक्सली भी अन्य आतंकियों की तरह बेगुनाह लोगों की जान लेते रहेंगे। कभी कभार उनका कोई कमांडर पकड़ लिया जाएगा तो जेल में उसे सारी सुख सुविधाएं दी जाएंगी। अदालत ने अगर उसे फांसी भी दे दी तो सरकार उसकी फाइल को लटकाए रहेगी। और ऐसा इसलिए क्योंकि नक्सली भी कथित रूप से वामपंथी हैं। सरकार और मीडिया में बैठे वामपंथी बुद्धिजीवियों को लगता है कि इस देश को खतरा केवल और केवल प्रखर हिंदूवादियों से है। थोड़ा बहुत खालिस्तानियों से भी है। लेकिन मुसलिम आतंकियों से नहीं.। वे तो राह भटके हुए हैं। उन्हें माफ कर मुख्य धारा में लाना चाहिए। उनकी नजर में नक्सली हमारे अपने हैं। नक्सली हों मुसलिम आतंकी सेना या पुलिस के जवान उन्हें प्रताड़ित करते हैं। मानवाधिकारों का उल्लंघन करते हैं। उनकी निंदा की जानी चाहिए। दिल्ली का बटला हाउस कांड हो गुजरात का सोहराबुद्दीन कांड सब साजिश थी। रही बात ईसाई मिशनरियों की तो वे तो सेवा करते हैं। शांति का प्रचार करते हैं।
जाहिर है, ऐसी स्थिति में तो न आतंकी हमले रुकने वालें हैं और न ही नक्सली। सो देशवासी इस तरह के हमले झेलने को तैयार रहें। हालांकि इस स्थिति के जिम्मेदार भी वे खुद ही हैं। उन्हें भी तो मतदान के समय इस बात का ध्यान नहीं रहता।

सोमवार, 31 अगस्त 2009

जाल के जरिए जड़ों से जुड़े रहने की जद्दोजहद

वे रोजी-रोटी हासिल करने के सिलसिले में विदेश में रह रहे हैं। लेकिन उनकी आत्मा भारत में बसती है। सो अंतरजाल पर ब्लॉगिंग के जरिए वे अपनी जड़ों से जुड़े रहने की जद्दोजहद करते रहते हैं। उनके भीतर कसक है कि हमारी हिंदी अंतरजाल पर किसी अन्य भाषा से कमतर न रहे। बहुत हद तक उन्होंने ब्लॉगिंग की दुनिया में हिंदी को प्रतिष्ठित करने में कामयाबी पाई है। समीर लाल, अनुराग शर्मा, राज भाटिया, राकेश सिंह और बबली जैसे कई ब्लॉगर हैं, जो हिंदी ब्लॉगिंग में नए कीर्तिमान गढ़ रहे हैं।समीरलाल की उड़नतश्तरी कनाडा से जबलपुर तक उड़ रही है। हिंदी का शायद ही ऐसा कोई ब्लॉगर हो, जो अपरिचित हो। बुजुर्ग हो चले समीर पेशे से कंसलटेंट हैं। और कनाडा के एंजेक्स (ओंटारियो) में रहते हैं। हिंदी के हर नए ब्लॉगर को प्रोत्साहित करना उनका शगल है। उन्हें हिंदी ब्लॉगरों का इस कदर स्नेह हासिल है कि अभी कुछ दिन पहले उनकी तबीयत खराब हुई तो पूरा हिंदी ब्लॉग जगत उनकी सलामती की दुआ करने लगा। उनके ब्लाग के बड़ी संख्या में पाठक हैं,जो उनकी लोकप्रियता की मिसाल है। बरेली के अनुराग शर्मा पिट्सबर्ग में रहते हुए भी खुद को बखूबी स्मार्ट इंडियन साबित कर रहे हैं। अच्छा लिखते हैं और कई विषयों की व्यापक जानकारी है। राज भाटिया जरमनी में रहत है। उन्होंने अपने ब्लॉग छोटी-छोटी बातें पर हिंदी के संदर्भ में महात्मा गांधी और महामना मदनमोहन मालवीय की उक्तियां भी लगा रखी हैं। झारखंड के रहने वाले युवा सॉफ्टवेयर इंजीनियर राकेश सिंह अमेरिका में रहते हुए भी हिंदी के उत्थान के लिए चिंतित रहते हैं। अपने ब्लॉग सृजन पर हिंदी की दुर्दशा के बारे में वह बहुत कुछ लिख चुके हैं। उनकी पीड़ा यह है कि हिंदी की स्तरीय पत्रिकाएं बंद होती जा रही हैं। क्वींसलैंड, आस्ट्रेलिया में रह रही हैं ३१ वर्षीय बबली कविता प्रेमी हैं। उनके ब्लॉग गुलदस्ता -ए-शायरी में गजलों के साथ दिए गए चित्र भी खूबसूरत होते हैं। ऐसे विदेश में रह रहे दर्जनों ब्लॉगर हैं, जो अंतरजाल के जरिए अपनी जड़ों से जुड़े रहने की जद्दोजहद करते रहते हैं।

शनिवार, 29 अगस्त 2009

महान कौन

निसंदेह महान लोग महान होते होंगे। लेकिन केवल वही महान नहीं होते, जो प्रसिद्ध पा जाते हैं। केवल वही महान नहीं होते जो गांधी जी की तरह समाज की चिंता में अपने को पारिवारिक सरोकारों से इस कदर अलग कर लेते हैं, कि उनकी संताने कुंठाग्रस्त हो जाती हैं। वे लोग भी महान होते हैं, जो पारिवारिक सरोकारों के साथ ही सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति सचेत और सजग रहते हैं। भले ही उनका दायरा अपने घर गांव शहर तक ही सीमित रहता हो।मैं अपने बारे में सोचता हूं। पत्रकारिता में होने की वजह से मेरी प्रसिद्धि का दायरा मेरे परिवार के अन्य लोगों की अपेक्षा थोड़ा अधिक है। हालांकि पत्रकारिता का उल्लेख करना भी मेरी धूर्तता है। वास्तव में पत्रकारिता के स्थान पर मुझे नौकरी शब्द का उल्लेख करना चाहिए, जिसकी वजह से मैं अपने पारिवारिक सरोकारों को अकसर उपेक्षित कर देता हूं। कृपया रेखांकित कर लें। परिवार से मेरा तात्पर्य मात्र पत्नी और बच्चों से ही नहीं है। मेरे लिए परिवार का अर्थ मेरे गांव में रहने वाला वह पूरा कुनबा है, जिसमें मेरे दर्जनों भाई हैं, दर्जनों बहने हैं। बुआ हैं, चाचियां हैं, दादा हैं चाचा हैं। भतीजे हैं, भतीजियां हैं और कई पौत्र और पौत्रियां तो हैं, कुछेक प्रपौत्र और प्रपौत्रियां भी हैं। कुछ लोगों को आश्चर्य होगा कि मेरे नौ साल के पुत्र उत्कर्ष भी बेटी दामाद वाले हो चुके हैं। हो चुके हैं नहीं बल्कि पैदा होने से पहले ही चुके थे।मुझसे छोटे मेरे एक भाई हैं, रमेशदत्त तिवारी। अपने पिता की चार संतानों में सबसे छोटे। एक बड़े भाई थे, उनके बाद दो बहनें और फिर रमेश हैं। सुलतानपुर में वकालत करते हैं। चाचा जी सेवानिवृत्त हो चुके हैं। चाचा जी का निधन तभी हो गया था, जब हम बहुत छोटे थे। हालांकि चाचा जी के पास अच्छी खेती थी। लेकिन वह खुद नौकरी करते थे, इसलिए खेती कराने वाले कोई नहीं था। बड़े पुत्र रामचंद तिवारी में तीनों गुण थे। अक्खड़, फक्कड़ और घुमक्कड़। आर्थिक प्रबंधन तो जानते ही नहीं थे। सो चाचा जी की भेजी रकम और कृषि उपज उन्हें पूरी नहीं पड़ती थी। कर्जा लेने में भी संकोच नहीं करते। लेकिन छोटे भाई और बहनों के प्रति कभी किसी चीज में उन्होंने कोताही नहीं की। सबको पढ़ाया लिखाया। शादी ब्याह किया। चाचा जी इन सब समारोहों में महज एक न्योताहरू की तरह उपस्थित हो जाते थे, बस। रमेश के बीए में पहुंचने तक चाचा जी सेवानिवृत्त होकर घर आ गए। लेकिन घर की आर्थिक हालत तब तक बदहाल हो चुकी थी। जब तनख्वाह से पूरा नहीं पड़ता था तो पेंशन से कैसे पूरा पड़ जाता। रमेश ने बीए के बाद ला किया और फिर सुलतानपुर में वकालत करन लगे। सुबह और छुट्टी वाले दिन खेती के काम देखते। इसका असर यह हुआ कि दो सालों में ही सब कुछ बदल गया। जमीन तो कम थी ही नहीं। उन्नत तरीके से खेती होने लगी तो उपज इतनी होने लगी कि बड़ी मात्रा में अनाज बेचा भी जाने लगा। रमेश मेहनती तो हैं ही, सो उनकी वकालत भी अच्छी चलने लगी। सामाजिक कार्यों में उनकी भागीदारी ने उन्हें लोकप्रियता भी दिला दी। बड़े भाई रामचंद्र ग्राम प्रधान बन गए। लेकिन इस बीच रमेश को कई असहनीय झटके झेलने पड़े। पांच साल के छोटे पुत्र की सड़क हादसे में मौत हो गई। प्रधान भइया की बेटी के पति का निधन हो गया। बड़ी बहिन के पति का असामयिक निधन हो गया। भांजे की पत्नी भी नहीं रही। तीन वर्ष पहले 55 की उम्र में ही प्रधान भइया भी साथ छोड़ गए। बावजूद इतने बड़े सदमों के रमेश कभी विचलित नहीं हुए। अपनी बेटी का विवाह किया। भाई की बेटी का दूसरा विवाह किया। उनके बेटे का विवाह किया। अपने बेटे सुनील को उच्च शिक्षा दिलाई। वह योग पर शोध कर रहा है। अभी हाल ही में रमेश को फिर एक झटका लगा।16 अगस्त को छोटी वाली बहिन के पति की करंट से मौत हो गई। उस बेचारी को भी भगवान ने कई दुख दिए। कुछ साल पहले किशोरावस्था में बेटा मर गया और अब पति ने साथ छोड़ दिया। वह और उसका परिवार लुधियाना में रहता है। रमेश तुरंत लुधियाना पहुंचे। आज यानी 29 अगस्त को रमेश फिर लुधियाना में हैं, क्योंकि जीजा जी की तेरही है। मैं चंडीगढ़ में होते हुए भी नहीं जा पाया। कल जाऊंगा। सोच रहा हूं। देखिए जा भी पाता हूं कि नहीं। कहते हैं वक्त बहुत बड़ा मरहम होता है, जो सारे घाव भर देता है। बहिन इस सदमे से शायद ही कभी उबर पाए। लेकिन मैं रमेश को जानता हूं। वह जीजा जी के न रहने पर उपजी परिस्थियों को दृष्टिगत रखते हुए बहिन और उसके बच्चों के लिए भविष्य की योजना बनाएंगे। फिर उस क्रियान्वित करने में अपनी तय शुदा भूमिका के अनुरूप पूरा योगदान करेंगे। वह मंगलवार को सुलतानपुर पहुंच कर रोजाना की तरह कचहरी करने लगेंगे। गांव परिवार की सारी जिम्मेदारियों को पूरा करने से कतराने के लिए इस हादसे का सहारा नहीं लेंगे। मैं समझता हूं कि हम जैसे लोगों की अपेक्षा जो सामाजिक सरोकारों पर अखबारों के पन्ने रंगते हैं, रमेश महान हैं। भले ही उनकी महानता के चर्चे अखबारों में न हों, किताबों में न हों।

सोमवार, 3 अगस्त 2009

देखन मां बौरहिया, आवें पांचो पीर

सुलतानपुर मेरा गृह जनपद । भगवान राम के ज्येष्ठ पुत्र कुश का बसाया हुआ। सन 1094 में तक इसका नाम कुशभवन पुर था। कुतबुद्दीन ऐबक ने सुलतानपुर पर हमला किया और उसके बाद इसका नाम सुल्तानपुर रखा, जो आज तक चला आ रहा है। यह अलग बात है कि हम जैसे कुछ लोग इसे सुलतानपुर कहते हैं। अर्थात सुंदर लताओं से घिरा हुआ (नगर) पुर। एक अति प्राचीन नगर होने के बावजूद सुलतानपुर की सन 1975 के पहले तककोई खास पहचान नहीं थी। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी ने देश में आपात काल घोषित किया, उसी दौरान उनके कनिष्ठ पुत्र संजय गांधी ने सुलतानपुर जनपद की दूसरी लोकसभा सीट अमेठी को अपनी कर्मस्थली के रूप में चुना। हालांकि वह सन 77 के अपने पहले चुनाव में हार गए। इसके साथ ही सुलतानपुर और अमेठी देश-विदेश में चर्चा का विषय बन गए। संजय गांधी 80 में जीते और उसके बाद से अमेठी उस परिवार का लोकसभा क्षेत्र बन गया। उसके बाद से तो सुलतानपुर और अमेठी को पूरी दुनिया जानने लगी। मेरा आशय आपको सिर्फ सुलतानपुर से परिचित कराना नहीं है। लेकिन जो बात मैं बताना चाहता हूं, उसके लिए सुलतानपुर के बारे में कुछ मूलभूत जानकारी देना आवश्यक था। तराइन के मैदान में मुहम्मद गोरी से पृथ्वीराज चौहान के पराजित हो जाने के बाद उनके परिवार के चार राजकुमार (जो रिश्ते में पृथ्वीराज के भाई थे) भाग निकले। उनका उद्देश्य था कि कुछ दिनों बाद सैन्य शक्ति से लैस होकर फिर गोरी से भिड़ेंगे। वे अज्ञातवास के क्रम में कुशभवन पुर पहुंचे। यहां उस समय भर राजा का शासन था। भर राजा ने उन्हें शरण दी और कुछ रियासतें दे दीं। गोरी के लौट जाने के बाद दिल्ली के तख्त पर बैठे कुतबुद्दीन ऐबक के गुप्तचरों को पृथ्वीराज चौहान के भाग निकले चारो भाइयों और उनके उद्देश्य के बारे में जानकारी थी। सो कुतबुद्दीन ने उनका पता लगाने के लिए गुप्तचरों से कहा। गुप्तचरों की कई टोलियां पूरे देश में निकल पड़ीं। पांच गुप्तचरों की एक टोली सुलतानपुर पहुंची। उल्लेखनीय है कि उसके पहले महमूद गजनवी का आक्रमण देश पर हो चुका था। उसके भांजे सैयद मसूद गाजी को बहराइच में सुहेलदेव के नेतृत्व में हिंदू राजाओं ने पराजित किया था और मार गिराया था। उसकी सेना के कुछ सैनिक जो अक्षम हो गए थे वे यहीं रहने लगे थे और बतौर फकीर भिक्षा मांग कर गुजर करते थे। यह बताने का तात्पर्य यह कि कुछ मुस्लिम इन फकीरों के रूप में उस समय अवध में आ चुके थे। कुशभवन पुर में भी एक मुस्लिम बुढिय़ा रहती थी, जो जन्मी तो किसी हिंदू परिवार में थी लेकिन किसी फकीर से शादी कर मुसलमान हो गई थी। पांचों ने उसी बुढिय़ा की झोपड़ी को अपना ठिकाना बनाया। उसके बाद अपना काम शुरू किया। इस बीच सुलतानपुर के राजा के गुप्तचरों को उनके बारे में जानकारी हो गया। उन्होंने उन पांचों को पकडऩा चाहा। पांचों भागे। लेकिन हिंदू सैनिकों ने उन्हें मार गिराया। इस तरह उनका तो अंत हो गया, लेकिन काफी दिनों तक जब वे दिल्ली नहीं पहुंचे और पृथ्वीराज के चारो भाइयों के बारे में भी कोई पता नहीं चला तो दिल्ली से एक गुप्तचार उन पांचों की खोज में रवाना हुआ। चूंकि यह जानकारी थी कि पांचों कुशभवन पुर गए थे। इसलिए वह सीधा सुलतानपुर पहुंचा। उसने भी बुढिय़ा को तलाश कर लिया। क्योंकि नगर में वही एक मात्र गैर हिंदू थी। उसे बुढिय़ा ने सारी घटना बता दी। उसने दिल्ली लौट कर सारी जानकारी ऐबक को दी। ऐबक ने कुशभवन पुर पर आक्रमण किया। हिंदू राजा को पराजय का सामना करना पड़ा। उसने वहां के सारे क्षत्रियों को उनकी जाति पूछ कर मारना शुरू किया। जो भी अपने को चौहान बताता मौत के घाट उतार दिया जाता। इससे बचने के लिए बहुत से चौहान क्षत्रियों ने खुद को चौहान के बजाय वत्सगोत्री बता दिया। अब वे बजगोती कहे जाते हैं। ऐबक ने कुशभवन पुर का नाम सुल्तानपुर रख दिया। उन पांचों गुप्तचरों का शहीद का दर्जा देकर उनकी मजार बनवाई और उन्हें पीर घोषित कर दिया। सुलतानपुर-अयोध्या मार्ग पर शहर से लगता हुआ गांव पांचों पीरन उन्हीं के नाम पर है। हर साल एक बड़ा मेला लगता है। उसमें बड़ी संख्या में हिंदू भी जाते हैं। अज्ञानतावश। हालांकि उन पांचो पीर की हकीकत बयान करने वाली एक लोकोक्ति सुलतानपुर में बहुत प्रचलित है-देखन मां बौरहिया, आवें पांचो पीर। मतलब देखने में बौरहा( भोला-भाला) लेकिन हकीकत में पांचों पीर जैसा धूर्त। एक बात और पांचों की मजारें थोड़ी-थोड़ी दूरी पर अलग-अलग जगह पर हैं। क्योंकि जब पांचों भागे थे तो अलग-अलग जगह पकड़े और मारे गए थे।

रविवार, 26 जुलाई 2009

व्यथित समाज की कुंठित अभिव्यक्ति

हरियाणा में गोत्र अथवा खाप विवाद कोई नया नहीं है। इससे पश्चिमी उत्तर प्रदेश का भी काफी हिस्सा प्रभावित है। इस क्षेत्र में पंचायतें बेहद प्रभावशाली हैं। उनका फैसला अंतिम होता है। हालांकि उनके फैसले भले ही सामाजिक प्रतिबद्धताओं से प्रभावित होते हों, लेकिन वे ज्यादातर कानून के दायरे में नहीं होते हैं। सामाजिक मर्यादाओं को तोडऩे पर पंचायतों का दंड अति भयंकर होता है। और अकसर जानलेवा भी। खाप व गोत्र के सैकड़ोंं युवक-युवतियों को प्रेम करने की सजा अपनी जान देकर चुकानी पड़ी है। यही नहीं कि सिर्फ खाप या गोत्र में ही प्रेम संबंध वर्जित हों। इसके इतर भी एक कारण है। और उसके मूल में छिपा है सूत्र वाक्य-गांव की बेटी अपनी बेटी। सो गांव में कोई वैवाहिक संबंध नहीं बना सकता । भले ही दोनों पक्ष गैर खाप, गोत्र या जाति हों। यही नहीं यदि एक गांव में पांच खापों के लोग रहते हों तो उन खापों में आपस में वैवाहिक संबंध नहीं बन सकते। भले ही दूसरा पक्ष सैकड़ो मील दूर के गांव का हो। इसके पीछे तर्क यह है कि गांव में जितनी भी खाप के लोग रहते हैं उनके आपस में भाई चारा होता है, सो वह दूसरी खाप की युवती को भी बहिन कहते हैं। अब अगर उसी खाप की युवती उसकी पत्नी बन कर आ जाए तो यह गलत होगा। आपस में जुड़े गांवों पर भी यह बात लागू होती है। अभी कुछ चार दिन पहले जींद जिले के एक युवक वेदपाल को इसकी सजा अपनी जान देकर भुगतनी पड़ी। वेदपाल बगल के गांव में अपना क्लीनिक चलाता था। दोनों गांव आपस में भाईचारे में बंधे थे। लेकिन वेदपाल, उसी गांव की एक युवती से प्यार कर बैठा, जहां उसका क्लीनिक था। दोनों ने घर से भाग कर आर्य समाज मंदिर में विवाह कर लिया। यह गांव की मर्यादा का उल्लंघन था। वेदपाल को गांव वालों ने पीट-पीट कर मार डाला। ऐसी सैकड़ों घटनाएं हो चुकी हैं। कई केस कोर्ट में भी पहुंचे हैं और देश भर मे चर्चा का विषय बने हैं। पंचायतों के इस तरह के फैसलों को कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता। ऐसा भी नहीं कि फैसला देने वाले अनपढ़ या जाहिल होते हैं। जान लें कि पंचायतों में बड़ी संख्या में उच्च शिक्षा प्राप्त युवक भी होते हैं। फिर इस तरह के फैसले क्यों? कालातीत हो चुकी सामाजिक प्रतिबद्धताओं पर इतना जोर क्यों? दरअसल इसके पीछे छिपी वजहों की तलाश के लिए हमें अतीत में झांकना होगा। इस क्षेत्र ने सबसे ज्यादा मुस्लिम आक्रमण झेले हैं। और राजनैतिक पराजय भी। मुस्लिम आक्रमणकारियों से भारतीय राजाओं की पराजय का मूल कारण यह था कि वह उन्हें लाहौर में रोकने के बजाय दिल्ली तक आने देते थे। उन्होंने सारी लड़ाइयां पानीपत या तराइन में लड़ीं। अगर वे लाहौर में लड़ते तो हार जाते तो भी दिल्ली बची रहती और उन्हें फिर चुनौती दे सकते थे। इसके ठीक विपरीत पंचायतों ने सांस्कृतिक मोर्चे पर ज्यादा बुद्धिमानी दिखाई। इस्लाम में दूध के रिश्तों को छोड़ कर वैवाहिक संबंध स्वीकार्य थे। इस तरह का प्रदूषण कहीं अपने समाज में न आ जाए इसलिए इतने सारे प्रतिबंध लगा दिए गए कि रिश्ते तो क्या खाप , गोत्र, गांव अगल-बगल के गांव में भी वैवाहिक संबंध पाप की श्रेणी में आ गया। लोग सामिष भोजन न करें। इसलिए लहसुन प्याज तक वर्जित कर दिया । अब लोग ये वर्जनाएं तोड़ रहे हैं। लहसुन प्याज खा रहे हैं। सामिष भोजन कर रहे हैं। पहले चोरी छिपे ऐसा करते थे, अब उसकी भी जरूरत नहीं समझते। चूंकि खान-पान नितांत वैयक्तिक मामला होता है, इसलिए पंचायतों ने भी उस तरफ चश्मपोशी करना ही बेहतर समझा। लेकिन जब वैवाहिक संबंधों में सामाजिक प्रतिबद्धताओं की अनदेखी होने लगी तो पंचायतों का व्यथित होना स्वाभाविक था। उन्होंने हजारों साल से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आखिर जिन रिश्तों की पवित्रता को सहेज कर रखा, आज उसे कैसे तार-तार होते देख सकते हैं। वे ऐसे अपकृत्य को वहशियाना समझते हैं , सो दंड भी वहशियाना होता है। यह एक व्यथित समाज की कुंठित अभिव्यक्ति है, जो कानून से भी टकराने को तैयार रहती है।

बुधवार, 22 जुलाई 2009

इंसाफ का तराजू

सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले की गूंज पर देश में सुनाई दे रही है। बात ही कुछ ऐसी ह। एक विक्षिप्त किशोरी का गर्भपात कराए जाने को देश की सबसे बड़ी अदालत ने रोक दिया। जिस खंडपीठ ने यह फैसला दिया उसमें मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन भी शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि किशोरी के बच्चे का पालन पोषण कुदरत करेगी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर देश भर में एक बहस छिड़ गई है। इस केस में हाईकोर्ट से चंडीगढ़ प्रशासन से किशोरी के गर्भपात की इजाजत मांगी थी। वह भी किशोरी के मानसिक और शारीरिक बेहतरी के लिए। पूरी नेकनीयती के साथ। हाईकोर्ट में तमाम बहस-मुबाहिसे के बाद इजाजत मिल गई थी। हाईकोर्ट में क्या-क्या हुआ, इसके पहले यह जानना जरूरी है कि यह किशोरी है कौन ? किशोरी सन २००५ में चंडीगढ़ के सेक्टर-२६ थाने के पुलिस जवानों को सड़क पर मिली थी। वे उसे थाने ले गए। वहां से उसे एसडीएम के समक्ष पेश किया गया। एसडीएम के आदेश पर उसे नारी निकेतन भेज दिया गया। तब से युवती वहीं पर थी। अभी हाल ही में वहां से उसे निराश्रितों के लिए बनाए गए एक अन्य स्थल आश्रय में लाया गया। आश्रय में एक दिन उसकी तबीयत बिगड़ गई तो इलाज के लिए मेडिकल कॉलेज में दाखिल हुई। वहां चिकित्सकों ने जांच में पाया कि वह लगभग दस हफ्ते के गर्भ से है। इसके बाद प्रशासन के हाथ पांव फूल गए। क्योंकि आश्रय और नारी-निकेतन दोनों का प्रबंधन और संचालन प्रशासन ही करता है। जाहिर था कि किशोरी के साथ बलात्कार हुआ था। गर्भ के समय से यह भी साफ था कि उन दिनों किशोरी नारी निकेतन में थी। पुलिस में प्राथमिकी दर्ज हुई। पूछताछ में किशोरी ने बताया कि नारी निकेतन में एक महिला उसे चौकीदार के पास ले जाती थी। पुलिस ने भूपेंद्र नाम के उस चौकीदार को गिरफ्तार कर लिया और उसका डीएनए टेस्ट कराने के लिए सैंपल भी ले लिए। जिस महिला के बारे में संदेह था, वह अग्रिम जमानत के लिए हाईकोर्ट चली गई। प्रशासन ने किशोरी की मानसिक स्थित को देखते हुए उसका गर्भपात कराने का फैसला लिया। बाद में कोई बखेडा़ न हो इसलिए प्रशासनिक अधिकारियों ने गर्भपात की इजाजत के लिए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में अर्जी दी। चूंकि यह अपनी तरह का अनोखा मामला था, इसलिए हाईकोर्ट ने इस केस में राय देने के लिए एक वरिष्ठ अधिवक्ता आरएस चीमा को अपना सहयोगी ( एमिक्स क्यूरी) नियुक्त किया और हरियाणा व पंजाब के महाधिवक्ता से भी कोर्ट में अपने विचार देने के लिए कहा।इस केस की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पुलिस की धीमी कार्रवाई पर जम कर फटकार लगाई। आरोपित महिला की अग्रिम जमानत याचिका भी हाई कोर्ट ने खारिज कर दी.।हाईकोर्ट में प्रशासन के अधिवक्ता अनुपम गुप्ता ने कहा कि किशोरी को मां बनने का अहसास तक नहीं है.। उसे रिश्तों के बारे में नहीं पता। ममता का उसे बोध नहीं। उसे इस पर दुख नहीं होता कि उसके साथ बलात्कार हुआ, बल्कि वह इससे दुखी होती है कि उसके कपड़े फट गए। उसकी मानसिक और शारीरिक स्थिति को देखते हुए यही बेहतर होगा कि गर्भपात करा दिया जाए। इस पर हाईकोर्ट ने पूछा भी कि ऐसी स्थिति में प्रशासन को इजाजत लेने की क्या जरूरत थी। इस पर गुप्ता ने कहा कि बाद में कोई बखेड़ा न हो, इसलिए अदालत की इजाजत लेना बेहतर समझा गया।हरियाणा के महाधिवक्ता हवा सिंह हुड्डा ने भी अदालत में राय दी कि कल्याणकारी राज्य होने के नाते प्रशासन को किशोरी के हित में गर्भपात की इजाजत लेने की जरूरत नहीं है। पंजाब के महाधिवक्ता एचएस मत्तेवाल का भी मत था कि मानवीय आधार पर गर्भपात की इजाजत दे देनी चाहिए। लेकिन एमिक्स क्यूरी चीमा की राय इसके विपरीत थी। उनका कहना था कि किशोरी चाहती है तो उसे बच्चे को जन्म देने दिया जाए। गौरतलब है कि पीजीआई के चिकित्सकों की काउंसिलिंग के दौरान किशोरी ने बच्चे को जन्म देने की इच्छा जताई थी। हाईकोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद प्रशासन को एक मेडिकल बोर्ड के गठन का आदेश दिया। इसमें बतौर सदस्य हाईकोर्ट ने अपनी प्रतिनिधि के रूप में चंडीगढ़ की जिला एवं सेशन न्यायाधीश राज राहुल को गर्ग को भी रखा। बोर्ड को किशोरी की मानसिक और शारीरिक स्थिति की जांच करने के बाद यह राय देनी थी कि गर्भपात उसके हित में है या नहीं। और गर्भपात कराया ही जाना है तो उसे बोर्ड के सदस्यों की देखरेख में कराया जाना चाहिए था। बोर्ड की रिपोर्ट आने के बाद एक बार फिर बहस हुई।प्रशासन के वकील अनुपम गुप्ता ने मनोचिकित्सकों की राय का हवाला देते गर्भपात के समर्थन में जोरदार तर्क दिए। लेकिन उतनी ही मजबूती से एमिक्स क्यूरी चीमा की तरफ से उनकी जूनियर तनु बेदी ने भी गर्भपात के विरोध में बहस की। तनु ने कहा कि मां की मानसिक विकलांगता गर्भपात का आधार नहीं हो सकती। उन्होंने तमाम भावनात्मक मुद्दे भी उठाए। बोर्ड के सदस्यों, मनोचिकित्सकों और जानकारों की राय तथा अन्य तथ्यों व बहस में दिए गए तर्कों के आधार पर हाईकोर्ट ने पाया कि गर्भपात ही किशोरी के हित में है और उसने गर्भपात की इजाजत दे दी। इसके खिलाफ कुछ स्वयंसेवी संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी और वहां से हाईकोर्ट का फैसला पलट दिया गया। शायद यह देश का पहला बच्चा होगा जो देश की सबसे बड़ी अदालत के आदेश पर जन्म लेगा। लेकिन विडंबना तो यह है कि उस बेचारे की मां विक्षिप्त होगी और बाप जेल में होगा। उसका बाप कौन है, यह जानने के लिए तो फिलहाल २२ लोगों के डीएनए टेस्ट की रिपोर्ट का इंतजार है।