रविवार, 23 अक्टूबर 2011
दीपावली आई
सोमवार, 5 जुलाई 2010
मोदी कह रहे होंगे, शुक्रया हेडली
इशरत जहां थी एक मानव बम
नई दिल्ली. लश्कर-ए-तैय्यबा से जुड़े अमेरिकी आंतकी डेविड हेडली ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के सामने खुलासा किया है कि गांधीनगर में पुलिस मुठभेड़ के दौरान मारी गई इशरत जहां लश्कर की मानव बम थी। सूत्रों ने बताया कि हेडली ने मुंबई की रहने वाली इशरत जहां के बारे में यह जानकारी एनआईए और कानून विभाग के अधिकारियों की चार सदस्यीय टीम को शिकागो में पूछताछ के दौरान दी। यह भी पता चला है कि हेडली ने भारत में लश्कर के लिए अपने आतंकी मिशन-2006 में शुरू किया था। इशरत जहां की मौत से खासा विवाद पैदा हुआ था।
पुख्ता हुई खुफिया सूचना
हेडली द्वारा दी गई यह सूचना गुजरात पुलिस और केंद्र की सूचना से मेल खाती है। इशरत के परिवार वालों के इस आरोप के बाद मुठभेड़ को लेकर बवाल मच गया था कि इशरत छात्रा थी। उसके परिवार वालों ने अदालत में इस संबंध में अपील भी दाखिल की थी। गुजरात पुलिस ने दावा किया था कि कुछ आतंकी राज्य के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमले के लिए राज्य गुजरात आए थे। इशरत, जावेद शेख उर्फ प्राणोश पिल्लै और दो पाकिस्तानी नागरिक अमजद अली और जीशान जौहर अब्दुल गनी 15 जून 2004 को मुठभेड़ में मारे गए थे। पुलिस रिकार्ड के मुताबिक इन सभी को अहमदाबाद शहर के बाहरी इलाके में नीले रंग की इंडिका कार में पकड़ा गया था। कार रोकने का संकेत करने पर उसमें बैठे लोगों ने पुलिस पर गोलियां चलानी शुरू कर दीं, जिसके बाद हुई जवाबी कार्रवाई में ये सभी मारे गए थे। इशरत की मां शमीमा कौसर ने गुजरात हाईकोर्ट में दाखिल अपनी याचिका में दावा किया था कि उनकी बेटी इत्र के कारोबारी शेख के साथ सेल्सगर्ल के रूप में काम कर रही थी।
क्या है मामला
15 जून 2004 को गुजरात पुलिस ने इशरत जहां, जावेद शेख उर्फ प्राणोश पिल्लै और दो पाकिस्तानी जीशान जौहर अब्दुल गनी और अमजद अली को एक मुठभेड़ में मार गिराया। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक इन सभी को अहमदाबाद शहर के बाहरी इलाके में नीले रंग की इंडिका कार में पकड़ा गया था। कार रोकने का संकेत करने पर उसमें बैठे लोगों ने पुलिस पर गोलियां चलानी शुरू कर दी, जिसके बाद हुई जवाबी फायरिंग में ये सभी मारे गए।
फर्जी मुठभेड़ बताया
इशरत के परिवार वालों ने इस इनकाउंटर को फर्जी बताते हुए अदालत की शरण ली। इशरत की मां शमीमा कौसर ने गुजरात उच्च न्यायालय में दाखिल अपनी याचिका में दावा किया कि उनकी बेटी इत्र के कारोबी शेख के साथ सेल्स गर्ल के रूप में काम कर रही थी।
इनकाउंटर करने वाली टीम
इस इनकाउंटर की अगुवाई सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ कांड में आरोपी डीआईजी डीजी वंजारा ही कर रहे थे। पुलिस का कहना था कि ये लोग नरेंद्र सिंह मोदी को निशाना बनाने के लिए आए थे।
आतंक में हुस्न का मेल
हेडली के बयान से स्पष्ट हो रहा है कि आतंकी देश में अपने काम को अंजाम देने के लिए ‘हुस्न’ का सहारा ले रहे हैं।
&&बाबाबाबातबाबा
गुरुवार, 3 जून 2010
शुक्रवार, 28 मई 2010
नक्सिलयों से नरमी क्यों
जाहिर है कि पहले की तरह इस बार भी परंपरागत रूप से वही बयान जारी किए जाएंगे, जो पहले जारी किए जाते थे। और कुछ ही दिन बाद नक्सली नई वारदात कर फिर बड़ी संख्या में लोगों को मार डालेंगे। सवाल यह है कि ऐसा कब तक होगा। हालांकि इसका जवाब किसी के पास नहीं है। नक्सली भी अन्य आतंकियों की तरह बेगुनाह लोगों की जान लेते रहेंगे। कभी कभार उनका कोई कमांडर पकड़ लिया जाएगा तो जेल में उसे सारी सुख सुविधाएं दी जाएंगी। अदालत ने अगर उसे फांसी भी दे दी तो सरकार उसकी फाइल को लटकाए रहेगी। और ऐसा इसलिए क्योंकि नक्सली भी कथित रूप से वामपंथी हैं। सरकार और मीडिया में बैठे वामपंथी बुद्धिजीवियों को लगता है कि इस देश को खतरा केवल और केवल प्रखर हिंदूवादियों से है। थोड़ा बहुत खालिस्तानियों से भी है। लेकिन मुसलिम आतंकियों से नहीं.। वे तो राह भटके हुए हैं। उन्हें माफ कर मुख्य धारा में लाना चाहिए। उनकी नजर में नक्सली हमारे अपने हैं। नक्सली हों मुसलिम आतंकी सेना या पुलिस के जवान उन्हें प्रताड़ित करते हैं। मानवाधिकारों का उल्लंघन करते हैं। उनकी निंदा की जानी चाहिए। दिल्ली का बटला हाउस कांड हो गुजरात का सोहराबुद्दीन कांड सब साजिश थी। रही बात ईसाई मिशनरियों की तो वे तो सेवा करते हैं। शांति का प्रचार करते हैं।
जाहिर है, ऐसी स्थिति में तो न आतंकी हमले रुकने वालें हैं और न ही नक्सली। सो देशवासी इस तरह के हमले झेलने को तैयार रहें। हालांकि इस स्थिति के जिम्मेदार भी वे खुद ही हैं। उन्हें भी तो मतदान के समय इस बात का ध्यान नहीं रहता।
सोमवार, 31 अगस्त 2009
जाल के जरिए जड़ों से जुड़े रहने की जद्दोजहद
शनिवार, 29 अगस्त 2009
महान कौन
सोमवार, 3 अगस्त 2009
देखन मां बौरहिया, आवें पांचो पीर
रविवार, 26 जुलाई 2009
व्यथित समाज की कुंठित अभिव्यक्ति
बुधवार, 22 जुलाई 2009
इंसाफ का तराजू
रविवार, 5 जुलाई 2009
सुल्तानपुर के एक राज परिवार के वंशज हैं बिग बी
अमर उजाला को धन्यवाद
रविवार, 28 जून 2009
कैसे पनपीं जातियां
"सर्वं तेजः सामरूप्य हे शाश्वत।
सर्व हेदम् ब्रह्मणा हैव सृष्टम्
ऋग्भ्यो जातं वैश्यम् वर्णमाहू:
यजुर्वेदं क्षत्रियस्याहुर्योनिम् ।
सामवेदो ब्रह्मणनाम् प्रसूति
अर्थात ऋगवेद से वैश्य, यजुर्वेद से क्षत्रिय और सामवेद से ब्राह्मण का जन्म हुआ। इस आधार पर ये भी मन जा सकता हैं कि अथर्ववेद का सम्बन्ध शूद्रों से हैं। जिस प्रकार कोई भी ज्ञानवां व्यक्ति किसी भी वेदों को दुसरे से ऊपर नहीं मान सकता उसी प्रकार उनसे जुड़े वर्ण भी एक दुसरे से ऊपर नहीं हो सकते।
अब फिर वापस आते हैं। उपाध्याय जी की बात पर। दरअसल ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ण के लोगों के कर्म एक ही थे। ब्राह्मणों का कार्य समाज को शिक्षित प्रशिक्षित करना था। क्षत्रियों का कार्य समाज की सुरक्षा करना और प्रशासिनक व्यवस्था को संभानलना था।लेकिन शूद्र, जिन्हें मैं शिल्पकार कहना बेहतर समझता हूं,वे अलग-अलग विधाओं में दक्षता हासिल करते थे और समाज को अपना अद्भुत योगदान देते थे। कोई लकड़ी के काम में निष्णात होता था तो कोई लोहे के काम में।सो उनके बच्चे भी घर में हो रहे काम में अपने माता-पिता की मदद करते-करते दक्ष हो जाते।
इस तरह से धीरे-धीरे उनकी एक कम्युनिटी विकसित होने लगी। ठीक वैसे ही जैसे आज ट्रेड यूनियन बन जाती है। लोग अपनी ही कम्युनिटी में में शादी ब्याह करने लगे। यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि ज्यादातर पुत्र अपने पिता के कार्य में पारंगत होकर उसी को चुन लेते थे। उनकी पुत्रियां भी उस कार्य में पारंगत हो जाती थीं। इससे अपनी कम्युनिटी में शादी ब्याह करने पर काम काज में तो सुविधा होती ही थी।नई वधू को भी मायके जैसा माहौल मिलता था और वह खुद को एडजस्ट करने में कोई दिक्कत नहीं पाती थी। इसी तरह ब्राह्मणों की कम्युनिटी भी बन गईं। अब आप सोचें कि यदि किसी ब्राह्मण की कन्या किसी क्षत्रिय घऱ में ब्याह कर आ जाती और अपने तरुण पति को युद्ध के लिए प्रयाण करते देखती तो यही कहती कि हे प्राणनाथ,छोड़ो आप युद्ध में क्यों जाते हो। हम भिक्षा मांग कर जीवन यापन कर लेंगे। जबकि क्षत्रिय कन्या अपने पति को अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित करती। कहती, विजय प्राप्त कर आना। मैं प्रतीक्षा करूंगी। क्योंकि वह मायके में यही देखती आई थी कि जब उसके पिता रणभूमि में जाते थे तो मां उनको सजाती थीं। सो इस तरह वर्णों के भीतर जातियों का अभ्युदय का क्रम शुरू हो गया, जो कालांतर में इतना मजबूत हो गया िक उपजातियां अस्तित्व में आ गईं। मेरे कहने का तात्पर्य मात्र इतना ही है कि जातियों का अभ्युदय तत्कालीन समाज की आवश्यकता थी, जो स्वतः स्फूर्त थी। और इसी व्यवस्था के तहत भारतीय समाज हजारों सालों से प्रगति के मार्ग पर चलता रहा। आज इसका दुरुपयोग हो रहा है तो वह इस व्वयस्था का दोष नहीं है। हां आज की स्थितियां भिन्न हो गई हैं। इसलिए जाति व्यवस्था पर प्रहार कर उसका खात्मा जरूरी हो गया है। लेकिन हमें इसका भी ध्यान रखना होगा कि हम विकल्प में क्या व्यवस्था देंगे और क्या भविष्य में उसका दुरुपयोग नहीं होगा।
सोमवार, 22 जून 2009
छोटी सी लव स्टोरी में कई ट्विस्ट
छोटी सी लव स्टोरी। लेकिन ढेरों ट्विस्ट। इजहार,तकरार,इनकार और इकरार। आगे क्या होगा? हरियाणा के पूर्व उप मुख्य़मंत्री चंद्रमोहन उर्फ चांद मोहम्मद अपनी दूसरी बीवी अनुराधा बाली उर्फ फिजा के कदमों में यूं ही बिछे रहेंगे? या फिर कुछ फिर से कुछ दिन बाद फिजा को तलाक देने का एलान कर देंगे। यह सवाल तब भी उठा था, जब उप मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने हरियाणा की अतिरिक्त महाधिवक्ता अनुराधा बाली से ब्याह रचाया था। तब भी यह बात उन लोगों के गले के नीचे नहीं उतरी थी, जो दोनों के स्वभाव से अच्छी तरह परिचित थे। इसीलिए जब चंद्रमोहन दो महीना बीतने से पहले ही अनुराधा को छोड़ कर चले गए तो लोगों को इसमें जरा भी आश्चर्य नहीं हुआ था। तब सबने यही कहा था कि यह तो होना ही था। दरअसल, दोनों को करीब से जानने वालों का दावा है कि दोनों के बीच में प्यार हो न हो, पर भरोसा कतई नहीं है। यह बात तब सच साबित हो गई, जब चांद अपनी फिजा को छोड़कर चले गए। तब फिजा ने उन पर तमाम तरह के लांछन लगाते हुए चंद्रमोहन के सालों पुराने एसएमएस और प्रेम पत्र सार्वजनिक कर दिए। जाहिर है कि कहीं न कहीं उनके मन में आशंका जरूर रही होगी तभी तो उन्होंने उसे सहेजा कर रखा था। दूसरी तरफ चंद्रमोहन को भी यह जानते हुए भी इससे उप मुख्यमंत्री का पद चला जाएगा, उनसे ब्याह रचाने की कौन सी जल्दी पड़ी थी। और जब ब्याह कर ही लिया, धर्म छूट गया, परिवार छूट गया, पद चला गया तो छोड़ क्यों दिया। छोड़ ही नहीं दिया, तमाम सारे आरोप भी लगा दिए। दरअसल, इन सारे सवाल के जवाब उनके लिए बहुत आसान हैं, जो दोनों से जुड़े रहे हैं। चंद्रमोहन जहां एक उच्छृंखल युवराज की तरह हैं, वहीं अनुराधा बेहद मह्त्वाकांक्षी। अनुराधा को लगा कि उनकी मह्त्वाकांक्षा बजरिए चंद्रमोहन पूरी हो सकती है तो चंद्रमोहन को लगा कि अनुराधा उनके मतलब की चीज हैं। दोनों एक दूसरे के कई साल करीब रहे। अनुराधा अधिवक्ता थीं। सो उन्होंने चंद्रमोहन और अपनी अंतरंगता के कुछ सुबूत भी तैयार कर लिए। वह शराब के बाद चंद्रमोहन की दूसरी सबसे बड़ी कमजोरी बन गईं। लेकिन जब चंद्रमोहन को लगा कि कहीं अनुराधा के पास सुरक्षित सुबूत उनके लिए खतरा न बन जाएं तो उन्होंने अनुराधा से ब्याह का प्रस्ताव रख दिया। यहां अनुराधा अपनी नारी सुलभ कोमलता के कारण मात खा गईं और दोनों ने मजहब बदल कर शादी कर ली। तब उन्होंने यह नहीं सोचा कि इस्लाम में तलाक सबसे ज्यादा आसान है। शादी के बाद उनके सुबूत बेमायने हो जाएंगे। और चंद्रमोहन जब चाहेंगे तलाक देकर फि्र अपने घर वापस लौट जाएंगे। हुआ भी वही। पर चंद्रमोहन एक चूक कर गए। अनुराधा के घऱ से निकलने के बाद जब वह विदेश गए तो चंद्रमोहन के नाम वाले पासपोर्ट पर ही। अनुराधा ने इसकी शिकायत कर दी। इसमें चंद्रमोहन सजा पा सकते हैं। कोई ताज्जुब नहीं कि अनुराधा पैरवी करतीं तो सजा भी हो जाती। फिर चुनाव लड़ने भी लायक नहीं रहते। सो, एक हफ्ते पहले तक फिजा को जिंदगी का काला अध्याय बताने वाले चंद्रमोहन रविवार 14 जून को सुबह फिजा के घर पहुंच गए। उनसे बेपनाह मोहब्बत का दावा करते हुए माफी मांगने लगे। रात नौ बजे बालकनी में उन्हें बाहों में लिए हुए यह एलान करते नजर आए कि फिजा ने हमें माफ कर दिया है। हालांकि अनुराधा ने माफी की बात पर तो हामी भरी पर यह भी साफ कर दिया कि अपनी शिकायतों को बगैर सोचे-विचारे वापस नहीं लेंगी। वैसे भी अनुराधा ने चंद्रमोहन के छोड़ जाने के बाद भी यही कहा था कि चांद उन्हें छोड़ कर नहीं जा सकते। उनके भाई कुलदीप ने उनका अपहरण कराया है। चंद्रमोहन ने अनुराधा के पास लौटने के बाद इसे स्वीकार भी किया। यह बात अलग है कि पहले उन्होंने कहा था वह बच्चे नहीं हैं कि कोई उनका अपहरण कर ले। बहरहाल, यह सब पुरानी बाते हैं। हम तो यही दुआ करेंगे फिजा ताजिंदगी चांद से रोशन होती रहें। वैसे भी चांद ने उन्हें छोड़ा था। उन्होंने नहीं। तभी तो मलेशिया जाने के लिए अपना पासपोर्ट बनवाया तो अपना नाम फिजा और पति का नाम चांद मोहम्मद लिखवाया। चंद्रमोहन के चले जाने के बाद मीडिया के जरिए जो ख्याति और सहानुभूति उन्हें मिली,वह उसे भुनाने से भी नहीं चूकीं। फिल्मों में काम करने के आफऱ तक मिले। टीवी के एक रियलिटी शो में ही भाग लेने मलेशिया जा रही हैं। अब क्या? अब तो दोनों हाथ में लड्डू है। चांद भी मिल गया और ख्याति भी। लेकिन चंद्रमोहन न घर के रहे न घाट के। फिजा अब उन पर भरोसा करेंगी नहीं और अब तो घर वापसी की भी सारी संभावनाएं खत्म हो गईं।
रविवार, 21 जून 2009
अपनों का दुःख
अब बहाना नहीं
बुधवार, 25 फ़रवरी 2009
आस क्या वस्तु है.
वो मिलेंगे ये विश्वास क्या वस्तु है.
शूल शय्या पे भी कष्ट मिलता नहीं
दर्द सहने का अभ्यास क्या वस्तु है
विष औ अमृत में कुछ भेद रखती नहीं
बावली हो गई प्यास क्या वस्तु है
बुधवार, 22 अक्टूबर 2008
बहुत दुखदायी होता है किसी अपने का चले जाना
रविवार, 19 अक्टूबर 2008
चिट्ठा। इस शब्द की परिभाषा क्या है? ब्लाग की भाषा में यह पोस्ट का हिंदी रूपातंरण है। या फिर हम कह सकते हैं कि यह चिट्ठी का पुल्लिंग है। दोनों बाते सही हैं। लेकिन सदियों से अवध में चिट्ठा शब्द का प्रयोग एक खास तरह की चिट्ठी के लिए किया जाता रहा है। अभी भी किया जाता है। मैं अवध की बात इसलिए कर रहा हूं क्योंकि मैं खुद वहीं का हूं। हो सकता है और भी क्षेत्रों में चिट्ठा का प्रयोग उसी अर्थ में किया जाता हो, जिसकी मैं आपसे चर्चा करने जा रहा हूं। गांवों में जब किसी के यहां कोई समारोह होता है और उसमें बिरादरी-भोज का आयोजन किया जाता है तो बिरादरी के लोगों को न्योता देने के लिए चिट्ठा भेजा जाता है। चिट्ठा की विशेषता यह होती है कि उस पर न तो टिकट लगता है और न ही उसे डाक के जरिये भेजा जाता है। बावजूद इसके जिस दिन यह भेजा जाता है बीसों की मील की दूरी तय कर मात्र दो-तीन घंटों में उसी दिन यथासमय पहुंच जाता है और शाम को लोग भोज में सम्मलित होने के लिए आ जाते हैं।अब थोड़ा इसकी प्रक्रिया के बारे में अवगत हो लें। जिस दिन भोज होता है, सुबह बिरादरी के बुजुर्ग उस घर की चौपाल में एकत्र होते हैं। कहां किस गांव में कितना न्योता भेजना है( मतलब यह कि कितने लोगों को न्योता भेजना है) तय करते हैं। फिर दो पन्नों को बीच से लंबा-लंबा फाड़कर आधा किया जाता है, क्योंकि चारों दिशाओं के लिए चार चिट्ठे तैयार करने होते हैं। चिट्ठा लिखने की शैली निर्थारित है। इसमें या तो जिस गांव में न्योता देना होता है वहां के किसी मानिंद आदमी का नाम लिख कर उसके आगे न्योते की संख्या लिख दी जाती है। या फिर उस गांव के जिन-जिन लोगों को न्योता देना होता है उनके नाम के आगे उन्हें जितना न्योता देना होता है वह लिख दिया जाता है। यदि न्योते के आगे वगैरह लिखा है तो वह व्यक्ति अपने साथ अपने परिवार के अन्य सदस्यों और इष्ट मित्रों को लेकर आने के लिए अधिकृत है। चिट्ठा तैयार हो जाने के बाद यह देखा जाता है कि गांव का कौन से आदमी किस दिशा में जा रहा है। ऐसे चार लोगों को चिट्ठा सौंप दिया जाता है। वह आदमी सबसे पहले पड़ने वाले गांव के किसी व्यक्ति को चिट्ठा सौंप कर अपने काम पर निकल जाता है। फिर जिस आदमी को चिट्टा मिला होता है वह अपने गांव में जिसका-जिसका न्योता होता है उसे सहेजता है और फिर वहां से किसी के हाथ तुरंत अगले गांव के लिए रवाना कर देता है। यह क्रिया तब तक चलती रहती है जबतक अंतिम गांव तक चिट्ठा नहीं पंहुच जाता और यह सब मात्र दो-तीन घंटों में ही हो जाता है। अब कृपया मेरे चिट्ठे पर गौर फरमाएं-
चिट्ठा ब्रह्मभोजजगदीश तिवारी पुत्र कालिका प्रसाद तिवारीगांव तिवारी पुरतिथि २६ नवंबर
गांव ब्लाग पुरश्री पीसी रामपुरिया ११ वगैरहश्री अनुराग शर्मा ११ वगैरहश्री दीपक तिवारी साहब ११ वगैरहश्री योगिंद्र मौद्गिल ११ वगैरहबाबा भूतनाथ ११ वगैरहश्री राज भाटिया ११ वगैरहश्री पवन तिवारी ११ वगैरह

