शुक्रवार, 28 मई 2010

नक्सिलयों से नरमी क्यों

मुट्ठी भर नक्सली देश के सत्ता को चुनौती दे रहे हैं। हमारी सरकार परंपरात रूप से बड़े हमले के बाद कड़ी कार्रवाई और सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद करने का बयान दे देती है। हमारे गृह मंत्री कुछ ईमानदार हैं, सो थोड़ी बहुत हिचकिचाहट के साथ यह स्वीकार कर लेते हैं कि उनके हाथ बंधे हैं। नक्सलियों से निपटने के लिए हमारे पास अधिकार नहीं हैं। और उसके बाद वित्त मंत्री का नसीहत भरा बयान आ जाता है कि यह भीतर की बात है। चिदंबरम को इसे सार्वजनिक नहीं करना चाहिए। इतना सुनने के बाद बेचारे चिदंबरम फिर बैकफुट पर चले जाते हैं। नक्सलियों से कहते हैं कि भाई आप केवल बहत्तर घंटे के लिए हिंसा रोक दें। हमसे बातचीत कर लें। लेकिन नक्सली उनकी पेशकश ठुकरा देते हैं। और फिर एक बड़ी वारदात हो जाती है। इस बार पश्चिम बंगाल में रेलवे ट्रैक उड़ा दिया जाता है और मुंबई जा रही एक्सप्रेस गाड़ी हादसे का शिकार हो जाती है। और ७६ जानें चली जाती हैं।
जाहिर है कि पहले की तरह इस बार भी परंपरागत रूप से वही बयान जारी किए जाएंगे, जो पहले जारी किए जाते थे। और कुछ ही दिन बाद नक्सली नई वारदात कर फिर बड़ी संख्या में लोगों को मार डालेंगे। सवाल यह है कि ऐसा कब तक होगा। हालांकि इसका जवाब किसी के पास नहीं है। नक्सली भी अन्य आतंकियों की तरह बेगुनाह लोगों की जान लेते रहेंगे। कभी कभार उनका कोई कमांडर पकड़ लिया जाएगा तो जेल में उसे सारी सुख सुविधाएं दी जाएंगी। अदालत ने अगर उसे फांसी भी दे दी तो सरकार उसकी फाइल को लटकाए रहेगी। और ऐसा इसलिए क्योंकि नक्सली भी कथित रूप से वामपंथी हैं। सरकार और मीडिया में बैठे वामपंथी बुद्धिजीवियों को लगता है कि इस देश को खतरा केवल और केवल प्रखर हिंदूवादियों से है। थोड़ा बहुत खालिस्तानियों से भी है। लेकिन मुसलिम आतंकियों से नहीं.। वे तो राह भटके हुए हैं। उन्हें माफ कर मुख्य धारा में लाना चाहिए। उनकी नजर में नक्सली हमारे अपने हैं। नक्सली हों मुसलिम आतंकी सेना या पुलिस के जवान उन्हें प्रताड़ित करते हैं। मानवाधिकारों का उल्लंघन करते हैं। उनकी निंदा की जानी चाहिए। दिल्ली का बटला हाउस कांड हो गुजरात का सोहराबुद्दीन कांड सब साजिश थी। रही बात ईसाई मिशनरियों की तो वे तो सेवा करते हैं। शांति का प्रचार करते हैं।
जाहिर है, ऐसी स्थिति में तो न आतंकी हमले रुकने वालें हैं और न ही नक्सली। सो देशवासी इस तरह के हमले झेलने को तैयार रहें। हालांकि इस स्थिति के जिम्मेदार भी वे खुद ही हैं। उन्हें भी तो मतदान के समय इस बात का ध्यान नहीं रहता।

6 टिप्‍पणियां:

राकेश कौशिक ने कहा…

इस स्थिति के जिम्मेदार भी वे खुद ही हैं। उन्हें भी तो मतदान के समय इस बात का ध्यान नहीं रहता।
बुल्कुल सही नहीं रखेंगे तो यही होगा

E-Guru Rajeev ने कहा…

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रवि धवन ने कहा…

सर बिना इच्छाशक्ति के इस समस्या का समाधान संभव नहीं है। फिर राजनीतिक दांव-पेंचों में भी यह मसला उलझा है। जाने कब तक हमारे देश के जवान और आम लोग अपने ही देश में जान की कुर्बानी देते रहेंगे।

जयराम “विप्लव” { jayram"viplav" } ने कहा…

" बाज़ार के बिस्तर पर स्खलित ज्ञान कभी क्रांति का जनक नहीं हो सकता "

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संगीता पुरी ने कहा…

हिंदी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए हमारी शुभकामनाएं !!

अजय कुमार ने कहा…

हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें