शनिवार, 14 जून 2008

कोहरे छंटने लगे संत्रास के

सो रहे हैं आज जो नीचे खुले आकाश के
देखना पन्ने बनेंगे एक दिन इतिहास के
धूप दुख की है,मरुथल है जिन्दगी
मर रहें हैं लोग मारे प्यास के
उपवनों में जाइएगा सोच कर
जंतु जहरीले बहुत हैं घास के
प्रतिदान में प्रभात को दे दो दुआ
कोहरे छंटने लगे संत्रास के
दे के दवाएँ सौरभ कोई न लूट ले
हमसफ़र मिलते नहीं विश्वास के

5 टिप्‍पणियां:

महेन ने कहा…

सुल्तानपुर के इस बदतमीज,बदतहजीब, बददिमाग,बदमिजाज,बदअक्ल,बदशक्ल, बेवफा,बेहया,बेगैरत,बेमुरौव्वत, बदजुबान,बदगुमान शख्स ब्लॉगजगत में अभिनंदन है। यह "अभिव्यक्ति" अच्छी लगी आपकी।

चण्डीदत्त शुक्ल ने कहा…

खुद की आलोचना करना बड़ा हुनर है. खासकर कटु आलोचना...हालांकि आप इस तरह के हैं नहीं, जैसा प्रोफाइल में लिखा है...मुझे तो नहीं लगे कम से कम. ब्लॉग बनाकर अच्छा किया पर इसे जिंदा रखिएगा...

SUNIL DOGRA जालि‍म ने कहा…

आपकी अभिव्यक्ति आकर्षक है, ब्लोग जगत मैं आपके स्वागत के साथ वर्ड वेरीफिकेशन भी हटा लें, शुभकामनायें

Amit K. Sagar ने कहा…

उम्दा रचना. लिखते रहिये. स्वागत है आपका. शुभकामनायें.
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उल्टा तीर

आशीष कुमार 'अंशु' ने कहा…

सुन्दर पोस्ट,

उससे भी बेहतर है आपका परिचय