रविवार, 19 अक्तूबर 2008

चिट्ठा। इस शब्द की परिभाषा क्या है? ब्लाग की भाषा में यह पोस्ट का हिंदी रूपातंरण है। या फिर हम कह सकते हैं कि यह चिट्ठी का पुल्लिंग है। दोनों बाते सही हैं। लेकिन सदियों से अवध में चिट्ठा शब्द का प्रयोग एक खास तरह की चिट्ठी के लिए किया जाता रहा है। अभी भी किया जाता है। मैं अवध की बात इसलिए कर रहा हूं क्योंकि मैं खुद वहीं का हूं। हो सकता है और भी क्षेत्रों में चिट्ठा का प्रयोग उसी अर्थ में किया जाता हो, जिसकी मैं आपसे चर्चा करने जा रहा हूं। गांवों में जब किसी के यहां कोई समारोह होता है और उसमें बिरादरी-भोज का आयोजन किया जाता है तो बिरादरी के लोगों को न्योता देने के लिए चिट्ठा भेजा जाता है। चिट्ठा की विशेषता यह होती है कि उस पर न तो टिकट लगता है और न ही उसे डाक के जरिये भेजा जाता है। बावजूद इसके जिस दिन यह भेजा जाता है बीसों की मील की दूरी तय कर मात्र दो-तीन घंटों में उसी दिन यथासमय पहुंच जाता है और शाम को लोग भोज में सम्मलित होने के लिए आ जाते हैं।अब थोड़ा इसकी प्रक्रिया के बारे में अवगत हो लें। जिस दिन भोज होता है, सुबह बिरादरी के बुजुर्ग उस घर की चौपाल में एकत्र होते हैं। कहां किस गांव में कितना न्योता भेजना है( मतलब यह कि कितने लोगों को न्योता भेजना है) तय करते हैं। फिर दो पन्नों को बीच से लंबा-लंबा फाड़कर आधा किया जाता है, क्योंकि चारों दिशाओं के लिए चार चिट्ठे तैयार करने होते हैं। चिट्ठा लिखने की शैली निर्थारित है। इसमें या तो जिस गांव में न्योता देना होता है वहां के किसी मानिंद आदमी का नाम लिख कर उसके आगे न्योते की संख्या लिख दी जाती है। या फिर उस गांव के जिन-जिन लोगों को न्योता देना होता है उनके नाम के आगे उन्हें जितना न्योता देना होता है वह लिख दिया जाता है। यदि न्योते के आगे वगैरह लिखा है तो वह व्यक्ति अपने साथ अपने परिवार के अन्य सदस्यों और इष्ट मित्रों को लेकर आने के लिए अधिकृत है। चिट्ठा तैयार हो जाने के बाद यह देखा जाता है कि गांव का कौन से आदमी किस दिशा में जा रहा है। ऐसे चार लोगों को चिट्ठा सौंप दिया जाता है। वह आदमी सबसे पहले पड़ने वाले गांव के किसी व्यक्ति को चिट्ठा सौंप कर अपने काम पर निकल जाता है। फिर जिस आदमी को चिट्टा मिला होता है वह अपने गांव में जिसका-जिसका न्योता होता है उसे सहेजता है और फिर वहां से किसी के हाथ तुरंत अगले गांव के लिए रवाना कर देता है। यह क्रिया तब तक चलती रहती है जबतक अंतिम गांव तक चिट्ठा नहीं पंहुच जाता और यह सब मात्र दो-तीन घंटों में ही हो जाता है। अब कृपया मेरे चिट्ठे पर गौर फरमाएं-

चिट्ठा ब्रह्मभोजजगदीश तिवारी पुत्र कालिका प्रसाद तिवारीगांव तिवारी पुरतिथि २६ नवंबर
गांव ब्लाग पुरश्री पीसी रामपुरिया ११ वगैरहश्री अनुराग शर्मा ११ वगैरहश्री दीपक तिवारी साहब ११ वगैरहश्री योगिंद्र मौद्गिल ११ वगैरहबाबा भूतनाथ ११ वगैरहश्री राज भाटिया ११ वगैरहश्री पवन तिवारी ११ वगैरह

5 टिप्‍पणियां:

अनूप शुक्ल ने कहा…

सही है। चिट्ठा शादी ब्याह में मांग की फ़ेहरिस्त को भी तो कहते हैं!

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

भाई पंडित जी आपने सही जानकारी दी है ! कुछ थोड़े से हेरफेर से यही परम्परा हमारे यहाँ गाँवों में भी मौजूद थी ! अब शायद नही है ! फ़िर भी इस प्रक्रिया को आपने यहाँ लिख कर नए लोगो को परम्पराओं से परिचित करवाया ! इसके लिए आपका बहुत धन्यवाद ! मेरा आपसे निवेदन है की ऎसी ही पुरानी और लुप्त होती परम्पराओं को आप लेखनी बद्ध करके यहाँ डालते रहे जिससे हमारी परम्पराओं को आने वाली पीढी भी जान सकेगी !

दीपक "तिवारी साहब" ने कहा…

चिठ्ठा शब्द की असली परिभाषा आज आपने की और आपने बहुत ही पुरानी यादो को ताजा कर दिया ! इस बात पर तिवारीसाहब का सलाम ! बहुत धन्यवाद आपको !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

त्रिपाठी जी,
चिट्ठे की एक नई (I mean पुरानी) परिभाषा के लिए धन्यवाद. हमारे यहाँ (उत्तर पांचाल देश में) चिटठा एक और अर्थ में भी प्रयुक्त होता है जैसे की "कच्चा चिट्ठा खोलना" मुहावरे में.

भूतनाथ ने कहा…

बहुत ज्ञानदायक बातें पता चली ! धन्यवाद !